सब कहीं न कहीं, अपने-अपने मामलों में व्यस्त हैं। कोई
कहीं जाता है, कोई कहीं जाता है। मनुष्य की कैसी जरुरत
है, जिसको वह पूरा करना चाहता है? मनुष्य की कुछ ऐसी
जरूरतें होती हैं, जिनको अगर मनुष्य रोकना भी चाहे तो
उसे रोक नहीं सकता है। शांति की जरूरत भी ऐसी ही
जरूरत है। वह अंदर की जो पुकार है, वह भी किसी का
लिहाज नहीं करती है। दुनिया वाले कहते हैं, "इधर देखो!
संसार की तरफ देखो! तुमको बड़ा आदमी बनना है"
परंतु सिर्फ संत-महात्मा ही सुनाते हैं कि
" घट में है सूझे
नहीं!" जिस चीज की आपको जरूरत है, वह तो आपके
अंदर बैठा हुआ है। जिससे आप असली नाम जोड़ना चाहते
हैं, वह आपके अंदर बैठा हुआ है। परंतु मनुष्य कहां खोजता
है? बाहर भेजता है। मैं चाहता हूं कि अब समय आ गया
है, अपने अंदर के भगवान का अनुभव करने का, जिसका
न चेहरा है, न दांत हैं, न आँखें हैं, न मुंह है, न कान हैं।
वह निरंतर आपके अंदर विराजमान है । उसका आप अनुभव
कर सकते हैं। हम मानने की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि
जानने की बात कर रहे हैं। आप जानना चाहते हैं तो सारी
दुनिया में देखिए। जहां मिले, वहीं ठीक है। अगर कहीं न
मिले तो हम हैं।
(प्रेम रावत शान्ति वक्ता)
(प्रेम रावत शान्ति वक्ता)
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