दो चीटियां
एक दिन दो चींटियां रास्ते पर जा रही थीं। उनमें से एक चींटी चीनी के पहाड़ पर रहती थी, जबकि दूसरी का घर नमक के पहाड़ पर था।
"मैंने तुम्हें आज से पहले कभी इधर नहीं देखा ... तुम कहाँ रहती हो?" नमक के पहाड़वाली चींटी बोली।
"मैं चीनी के पहाड़ पर रहती हूँ। दूसरी चींटी ने जवाब दिया। "चीनी का पहाड़? चीनी क्या होती है?" नमक वाली चींटी ने पूछा। "चीनी बहुत ही मीठी और स्वादिष्ट होती है। चीनी के बारे में जरा सा सोचकर ही मेरे मुंह में पानी आ गया है। क्या तुम्हें यकीन नहीं है कि तुमने पहले कभी चीनी नहीं खायी है?"
"हमारे तो चारों तरफ यहां नमक ही है। तुम इसे खा सकती हो। लेकिन नमक खाने से बहुत प्यास लगती है। मुझे चीनी के बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा, जैसाकि तुमने अभी बताया।"
"तो ठीक है, किसी दिन आओ और हमारे चीनी के पहाड़ पर घूमो । खुद महसूस करो कि इसका स्वाद कितना अच्छा है।" फिर क्या था, दोनों बेटियों ने चीनी के पहाड़ पर मिलने के लिए एक
तारीख तय कर ली। चीनी के पहाड़वाली चींटी ने उसे रास्ते के बारे में बताया कि किस तरह वह चीनी के पहाड़ पर पहुंचेगी। जैसे-जैसे चीनी के पहाड़ पर जाने का दिन करीब आने लगा, नमकवाली चींटी ने सोचना शुरू किया।
" अगर मुझे चीनी अच्छी नहीं लगी, तब क्या होगा। इतनी लंबी दूरी तय करके वहां पहुंचने तक तो मुझे भूख लगने लगेगी। ऐसे हालात अपने मुंह में रखकर थोड़ा-सा नमक भी साथ ले जाना चाहिए।" उधर चीनी के पहाड़ पर, चीनीवाली चींटी नमक वाली चींटी का बेसब्री से इंतजार कर रही थी।
"मेरे चीनी के पहाड़ पर तुम्हारा स्वागत है! यह लो, थोड़ी चीनी चख लो और देखो कि इसका स्वाद कितना अच्छा है।" नमक वाली चींटी ने थोड़ी-सी चीनी को चखा और बोली- "हां, हां! इसका स्वाद भी तो मेरे नमक के जैसा है।" उसके इस जवाब से हैरान होकर चीनीवाली चींटी ने पूछा, "क्या तुम्हें पक्का यकीन है? चीनी और नमक का स्वाद तो एकदम अलग होता हैं!
थोड़ी चीनी और चखो!" नमक वाली चींटी ने थोड़ी चीनी और अपने मुंह में रखी।
चखने के कुछ पल बाद वह बोली, "हां! बिल्कुल इसका स्वाद तो मेरे नमक जैसा ही है। यहां चारों तरफ तुम लोग इसे चीनी कहते हो, किन्तु जहां मैं रहती हूं, वहां इसे नमक कहते हैं। लेकिन ये दोनों एक ही हैं।" चीनी के पहाड़ पर रहने वाली चींटी अच्छी तरह जानती थी कि नमक
और चीनी दोनों का स्वाद अलग-अलग होता है, इसलिए उसे लग रहा था कि कहीं कुछ गड़बड़ है। उसने एक पल के लिए सोचा और फिर दूसरी वाली चींटी से पूछा - "जरा अपना मुंह तो खोलो, जिससे मैं देख सकूं कि तुम्हारे मुंह के भीतर क्या है?"
नमकवाली चींटी ने जब अपना मुंह खोला तो दूसरी वाली चींटी ने देखा कि उसके मुंह में नमक की बड़ी-सी डली रखी हुई है। "एक समस्या है। पहले तुम अपने मुंह में से नमक की डली बाहर निकालो, फिर दुबारा से चीनी खाकर देखो।"चीनीवाली चींटी ने कहा।
नमकवाली चींटी ने नमक की डली मुंह से निकाली और फिर थोड़ी-सी चीनी खाकर देखी। तब, इस तरह उसे मीठे के असली स्वाद का पता चला। वह उछल पड़ी -"वाह! यह तो लाजवाब है, कितना मीठा है! मैं अब कभी नमक के पहाड़ पर नहीं जाऊंगी।"
"जीवन में हमें अगला कदम उठाने से पहले पिछला कदम छोड़ना पड़ता है। सफलता का निर्माण हमारे आगे बढ़ने की क्षमता सीखने और विकसित होने की योग्यता पर निर्भर करता है। आगे बढ़ने के लिए, खुद को विकसित करने के लिए हमें जीवन में जो कुछ अच्छा है, उसे ग्रहण करना चाहिए, स्वीकार करना चाहिए और जो अनावश्यक है, उसे पीछे छोड़ देना चाहिए।
जितना ज्यादा हम ऐसा करेंगे, उतनी ही ज्यादा सफलता हमें मिलेगी। यह कहानी यह भी सिखाती है कि कई बार हम स्वयं ही अपने सबसे बड़े शत्रु बन जाते हैं। हमने एक स्वभाव बना लिया है कि हम चीजों को उस रूप में स्वीकार नहीं करते, जैसी वे असलियत में हैं, बल्कि हर चीज को अपने ही नजरिये से देखते हैं।
कुछ लोग मुझसे पूछते हैं - "क्या जीवन में सब भाग्य से तय नहीं होताहै? फिर ऐसे में मेरे पास क्या रास्ता है, जबकि सबकुछ पूर्व निर्धारित है?
अब यदि आपके भाग्य के पत्ते ही फेंटकर लगा दिए है तो फिर आप खुद में कोई निर्णय लेने वाले कौन होते है?
मैं उत्तर देता हूं- "नहीं। यह सब भाग्य से तय नहीं होता है । हमारे अपने भ्रम, हमारी अपनी दुविधायें ही हालत विकल्पों को अपनाने पर बाध्य करती हैं और हमारी ज्यादातर परेशानियों का भी यही कारण है। लेकिन जब हम इस विचार को छोड़ देंगे कि चीजों को कैसा होना चाहिए, तभी हम चीजों को उस रूप में देखने लगेंगे, जैसी वे हैं। तब हमारे पास ढ़ेर-सारे विकल्प होंगे। जब हम जागृत ह्दय से,सोच समझकर कोई रास्ता चुनते हैं तो यह ऐसे होता हैं, जैसै अंधेरे में दीया जलाना।
जब एक दीया जलता हैं, चाहे वह दीया कितना भी छोटा हो, तब हम उन चीजों को देख सकते हैं, जो हम अँधेरे में नही देख पा रहे थे। सचेत होकर चुनना आपकी शक्ति बन जाती है, वह आपका अपना दीया हैं, जो अंधेरे को भगाता हैं।
*लेखक:-*
*अंर्तराष्ट्रीय शांति वक्ता "प्रेम रावत"*
